बांग्लादेश: तारिक़ रहमान के प्रधानमंत्री बनते ही नई राजनीतिक हलचल, भारत के साथ संबंधों में सुधार के संकेत

ढाका/नई दिल्ली:

बांग्लादेश में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत हो गई है। हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में मिली भारी जीत के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता तारिक़ रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है। 17 फरवरी 2026 को ढाका में आयोजित एक भव्य समारोह में उन्होंने कार्यभार संभाला। तारिक़ रहमान की सत्ता में वापसी ने न केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों, विशेषकर भारत के साथ संबंधों को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

विवादों के साये में ताजपोशी

तारिक़ रहमान का प्रधानमंत्री बनना विवादों से अछूता नहीं रहा। करीब 17 साल के लंदन निर्वासन के बाद लौटे तारिक़ रहमान की जीत को उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सिरे से खारिज कर दिया है। भारत में शरण ले रहीं शेख हसीना ने इन चुनावों को 'लोकतंत्र का अपमान' और 'प्रशासनिक धांधली' करार दिया है।

दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और छात्र आंदोलनों के बीच इस बात को लेकर भी चिंता है कि क्या नई सरकार 2024 के जन-विद्रोह के लोकतांत्रिक मूल्यों को बरकरार रख पाएगी। हालांकि, तारिक़ रहमान ने अपने पहले संबोधन में स्पष्ट किया कि उनकी सरकार 'प्रतिशोध की राजनीति' के बजाय 'समावेशी विकास' पर ध्यान देगी।

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भारत के प्रति नरम रुख: 

भारत और BNP के बीच का इतिहास तनावपूर्ण रहा है, लेकिन इस बार संकेत थोड़े अलग हैं। सत्ता संभालते ही तारिक़ रहमान ने भारत के प्रति अपने रुख में नरमी दिखाई है।

 * वीजा सेवाओं की बहाली: संबंधों में सुधार की दिशा में पहला ठोस कदम उठाते हुए, बांग्लादेश सरकार ने दिल्ली में अपने उच्चायोग में सभी श्रेणियों की वीजा सेवाएं बहाल कर दी हैं। पिछले कुछ महीनों से जारी तनाव के कारण ये सेवाएं काफी हद तक सीमित थीं।

 * पीएम मोदी की बधाई: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक़ रहमान को उनकी जीत पर बधाई दी और उन्हें भारत आने का निमंत्रण भी दिया है। मोदी ने अपने पत्र में 'साझा सुरक्षा और समृद्धि' के लिए मिलकर काम करने की इच्छा जताई है।

 * शेख हसीना का मुद्दा: संबंधों में सबसे बड़ा कांटा शेख हसीना का भारत में होना है। हालांकि BNP के कुछ नेताओं ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की है, लेकिन तारिक़ रहमान ने कूटनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए कहा है कि यह एक 'कानूनी प्रक्रिया' है और वह नहीं चाहते कि एक व्यक्ति के कारण दो देशों के व्यापक हित प्रभावित हों।

चुनौतियां और भविष्य की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि तारिक़ रहमान के लिए आने वाला समय 'कांटों भरा ताज' साबित हो सकता है। उन्हें एक तरफ अपनी पार्टी के कट्टरपंथी सहयोगियों (जैसे जमात-ए-इस्लामी) को संतुष्ट रखना होगा, तो दूसरी तरफ भारत जैसे महत्वपूर्ण पड़ोसी के साथ विश्वास बहाली करनी होगी।

भारत के लिए भी यह एक नई कूटनीतिक परीक्षा है। नई दिल्ली को अब अवामी लीग के साथ अपनी पुरानी करीबी को पीछे छोड़ते हुए बांग्लादेश की नई वास्तविकता के साथ तालमेल बिठाना होगा। 'चिकन नेक' (Siliguri Corridor) की सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और तीस्ता जल समझौते जैसे मुद्दे इस नई साझेदारी की मजबूती की असली कसौटी होंगे।

फिलहाल, ढाका से दिल्ली तक कूटनीतिक गलियारों में एक 'सकारात्मक हिचकिचाहट' है। दोनों पक्ष हाथ मिलाने को तैयार दिख रहे हैं, लेकिन पुरानी कड़वाहट की यादें अभी भी पूरी तरह मिटी नहीं हैं।


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